"हरियाणा कविता: हरियाणा की धरोहर, सांस्कृतिक गौरव | लेखक: दीप जांगड़ा"
**************** हरियाणा***************** हरियाणा मैं जन्म दिया तनै धन धन जननी माई कण कण मैं दिखै राम मनै छंद छंद मैं कविताई हरी की भूमि कहलाया तो मिल्या नाम हरियाणा जी छैल छबीले माणस सैं आडै दूध दही का खाणा जी आये गए कि इज्जत सै म्हारा सीधा सादा बाणा जी ज्ञान की बात करैं सारे आडै बुड्ढा हो चाहे स्याणा जी होक्के पै पंचात बैठ जया रीत सदा चली आई कण कण मैं दिखै राम मनै छंद छंद मैं कविताई गंठे गैल्यां रोटी खा लयाँ ना रीस करां हम खाणे की दुनिया मैं पूरी चौधर सै किते बूझ लियो हरियाणे की खेल सै कुश्ती और कब्बडी गात तोड़ दें याणे की खाड़यां मैं म्हारे छैल गाभरु माटी कर दें स्याणे की देश विदेश मैं गाडे सैं लठ खेलां मैं सै खूब चढ़ाई कण कण मैं दिखै राम मनै छंद छंद मैं कविताई सारे दुनिया मैं नां बोल्लै सै दादा लख्मीचंद बामण का किते नही पावै दुनिया मैं तीज त्यौहार यो साम्मण का नही पहरावा मिलै किते भी बावन गज के दाम्मण का ठंडी छाँ बरगे माणस ज्यूकर पेड़ होवै सै जाम्मण का हरदम बॉर्डर पै खड़े रहैं म्हारे सब तै घणे सिपाई कण कण मैं दिखै राम मनै छंद छंद मैं कविताई सांग रागणी के किस्से...