धैर्य

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अज्ञान में कहां मिले जो ज्ञान में भी नही है
जहन में क्यों मिलेगा जो जहान में भी नही है
जी घोर अन्धकार है भजन में ही उद्धार है
राम नाम ही अनंत बाकी तो बंटाधार है
मानो तो सब जगह है और ना मानो तो ....
ना किसी भी धर्म में ईमान में भी नही है
फ़सल कटे तो घर भरे परिवार का भरण करे
वो अन्न का है देवता जो भूखमरी में ही मरे
वो बीज में नही है तो किसान में भी नही है
वो खेत में क्या होगा खलिहान में भी नही है
उजाड़ है ऊंचे महल ना प्यार की जहां चहल
अंधकार है पसरा हुआ कैसे सके कोई टहल
वो शोक में नही है वो उल्लास में भी नही
घर में क्या करेगा जो मकान में भी नही है
लाश एक फकीर की मिली मरे ज़मीर की
मिट्टी आज खो गई रौनक उस तकदीर की
ना हार के दुखों में क्या जीत के ऐलान में भी नही है
आशियाने में कब मिला शमशान में भी नही है
इज्जतों के मोल हैं ईमान में तो झोल है
कदम वहां रुके जहां पे प्यार के दो बोल हैं
जो ना मिला पड़ोस में संसार में भी नही है
बाजारों में क्यों खोजे जो दुकान में भी नही है
अपार है अनंत है जो मृत भी है जीवंत है
वो हर कण मौजूद है वो सूत है कलांत है
वो राजाओं से दूर है गुलाम में भी नही है
वो कर्ज के खिलाफ है लगान में भी नही है
चरित्र में वो ईत्र में सगे में है वो मित्र में
खुशबुओं में शेष है वो हर एक नक्षत्र में
वो महफिलों में नहीं है तो ध्यान में भी नही है
ना भक्त में मिला कभी इमाम में भी नहीं है
अज्ञान में कहां मिले जो ज्ञान में भी नही है
जहन में क्यों मिलेगा जो जहान में भी नही है
दीप जांगड़ा

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